Sunday, 6 September 2020

किस बात का तुझको डर हैं


किस बात का तुझको डर हैं


किस बात का तुझको डर हैं
जब साथ खुद के तू है
क्यूं है तू रुका पड़ा
 जब कदमों में तेरी जान हैं
क्यूं  है ख़ुद से तू रूठा हुआ 
जब मनाना भी खुद ही को हैं

किस बात का तुझको डर हैं
जब साथ खुद के तू है

समझ ना खुद को तन्हा तू
वो खुदा भी तेरे साथ है
क्यूं है तू झुक रहा 
इस परीक्षा की घड़ी में 
क्यूं है  तू टूट राहा
जब समेटना भी खुद ही को हैं

किस बात का तुझको डर हैं
जब साथ खुद के तू है


3 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना है आप की बहुत अच्छा लिखती हैं आप शुभकामनाएँ ।

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  2. बहुत अच्छी, बहुत सच्ची तथा बहुत प्रेरक रचना ।

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  3. प्रेरक रचना और बहुत ही खूबसूरत !

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